अमीनाबाद और पास का चौक पुराने लखनऊ का दिल हैं, बाज़ारों, खाने की गलियों और ऐतिहासिक इमारतों की एक भूलभुलैया जो सदियों से शहर के व्यापार का केंद्र रही है। यहीं आपको चिकनकारी कढ़ाई, इत्र की दुकानें, मशहूर कबाब घर और ऐसी मिठाई की दुकानें मिलेंगी जिन्हें पीढ़ियों से एक ही परिवार चला रहे हैं। मायरा सदस्यों के लिए पुराना लखनऊ पहली या दूसरी डेट के लिए एक यादगार, ज़ायकेदार माहौल देता है। यहाँ के परिचयों में अक्सर चौक, लालबाग, नज़ीराबाद, वज़ीरगंज और रकाबगंज के लोग होते हैं। यह इलाक़ा सुबह से देर रात तक व्यस्त रहता है, और जिसे इसकी आदत न हो उसके लिए यह भारी पड़ सकता है। इसीलिए बहुत-से सदस्य किसी जानी-मानी दुकान या पहचान वाली जगह पर मिलने और फिर बैठने के लिए कोई शांत जगह चुनने का सुझाव देते हैं। खाना यहाँ का मुख्य आकर्षण है, कबाब से कुल्फ़ी तक, और किसी मशहूर पुराने रेस्तराँ में साथ खाना लखनऊ का एक क्लासिक अनुभव है, जहाँ बात करने को बहुत कुछ मिल जाता है। पुराने शहर में, बस थोड़ी दूरी पर, बड़ा इमामबाड़ा जैसे स्मारक भी हैं, जिन्हें दिन के उजाले में एक लंबी सैर में जोड़ा जा सकता है। इस बाज़ार की स्थापना अठारहवीं सदी में इमदाद हुसैन ख़ान अमीनुद्दौला ने की थी, और इसका झंडेवाला पार्क स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान सभाओं की एक अहम जगह था।
अमीनाबाद में कहाँ मिलें
अमीनाबाद के बाज़ार
कपड़ों, चिकनकारी और रोज़मर्रा के सामान की गलियाँ। देर दोपहर में साथ घूमने में मज़ा आता है।
चौक की खाने की गलियाँ
पुराने शहर में मशहूर कबाब, बिरयानी और मिठाई की दुकानें, जिनका असली मज़ा शाम को है।
चिकनकारी की ख़रीदारी
कारीगरों को काम करते देखें और वह कढ़ाई वाला कपड़ा देखें जिसके लिए लखनऊ जाना जाता है।
टुंडे और कुल्फ़ी के पड़ाव
क्लासिक लखनवी नाश्ता और कुल्फ़ी, पुराने शहर की किसी भी सैर का ज़रूरी हिस्सा।
आना-जाना
मेट्रो रेड लाइन के चारबाग़ और हुसैनगंज स्टेशन पास हैं। बाज़ार की तंग गलियों से गुज़रने का सबसे आसान तरीक़ा ई-रिक्शा है; कारें ट्रैफ़िक में फँस जाती हैं।
ध्यान रखने वाली बातें
- गलियों में बेहद भीड़ रहती है। फ़ोन और बटुआ संभालकर रखें और मिलने के लिए कोई पहचान वाली जगह तय कर लें।
- देर शाम व्यस्त मुख्य गलियों में ही रहें और भीड़ के साथ ही निकलें।
लखनऊ के दूसरे मोहल्ले
अमीनाबाद में किसी से मिलने से पहले
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अमीनाबाद के पास सत्यापित लोगों से मिलें
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